सतना जिले मंे जनजाति जनसंख्या का वितरण व संकेन्द्रण: एक भौगोलिक अध्ययन
रामनरेश कुशवाहा
शोधार्थी भूगोल शासकीय ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय रीवा मप्र
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
प्रस्तुत शोध पत्र मध्यप्रदेश के सतना जिले की अनु. जनजातियो की जनसंख्या का वितरण व संकेन्द्रण के संदर्भ में हैं। भारतीय संविधान के 16वें भाग में कुछ विशेष समुदायो का उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेद की धारा-330 में अति विशेष वर्गो की सुविधाओ का वर्णन किया गया है, जिन्हे अनु. जनजाति कहा गया है, इन जनजातियो का भारतीय इतिहास में प्रमुख स्थान रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था मे इनका वितरण व सकेन्द्रण महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आदिम युगीन जनजातियाॅ प्राचीन भारतीय संस्कृति व सभ्यता को समेटे हुए है। इन्हे आदिम जातियाॅ, जनजातियाॅ, वनवासी आदि नामो से जाता है। वर्तमान में भी जनजाति वर्गो का अधिकतर समूह बीहड़ जंगलो में निवासरत है, जो सांसारिक वैभव तथा विलासता से दूर अभाव ग्रस्त जीवन व्यतीत कर रही है।
KEYWORDS: सतना, जनजाति जनसंख्या
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सतना जिले की जनजातीय जनसंख्या का वितरण व संकेन्द्रण जानने से पूर्व हमें विभिन्न विधानों, शोधकर्ताओं द्वारा दी गई जानकारी को जानना अत्यंत आवष्यक हो जाता है। भारत की अनुसूचित जनजातियों को प्रसिद्ध विद्वान एच.एच. रिजले, ग्रिगसन, सेनविक, मार्टिन, टेलेट्रस सोलर्ट व ठक्कर ने इन्हें आदिवासी शब्दों से संबोधित किया है। एल्विन ने इन्हें आदि स्वामी हट्टन ने प्राचीन जनजाति, वेन्स ने वन्य जाति कहा है।
डी0एन0 मजूमदार के अनुसार:-
जनजाति परिवारों या परिवार समूहों का संकलन होता है, जिसका एक सामान्य नाम होता है जिसके सदस्य एक सामान्य भू-भाग में निवास करते हैं, समान भाषा बोलते है और विवाह व्यवसाय व उद्योग के संबंध में निश्चित निषेधात्मक नियमों का पालन करते हैं और पारस्परिक कर्तव्यों की सुविकसित व्यवस्था को स्वीकार करते है। इस प्रकार विदित होता है कि कोई जनजाति एक निश्चित भू-भाग में निवास करती है उसके सदस्य एक सामान्य भाषा का प्रयोग करते है प्रत्येक जनजाति का एक निश्चित नाम होता है उसकी निश्चित शिक्षा-संस्कृति होती है और उसके खान-पान, विवाह, व्यवसाय, धर्म आदि से संबधित निषेधों का पालन किया जाता है इसके साथ ही एक जनजाति का सामान अपना निजी राजनीतिक संगठन होता है जिसके नियंत्रण में सामाजिक जीवन संकलित तथा नियंत्रित होता है एक जनजाति सामान्यतः कई गोतों से मिलकर बनी होती है।
रिवर्स के अनुसार -
जनजाति एक ऐसा सरल समूह है जिसके सदस्य एक बोली बोलते हो और जो युद्ध के समय सम्मलित रूप कार्य करते हो।,
मार्डो के अनुसार:-
जनजाति का अर्थ आर्थिक दृष्टि से ऐसा स्वतंत्र जन समूह जो एक भाषा बोलता है और वाह्य आक्रमण से सुरक्षा के लिए संगठित होता है।’
जेकन्स तथा स्टर्न की व्याख्या - एव ऐसा ग्रामीण समुदाय जिसकी समान भूमि हो, समान भाषा हो, समान संस्कृति विरासत हो और जिस समुदाय के व्यक्तियों का जीवन आर्थिक दृष्टि से एक दूसरे के साथ ओत-प्रोत हो जनजाति कहलाता है।
रिचर्ड के अनुसार:-
समूहों की श्रृंखला परिमाण में जब बढ़ती जाती है तब उसका अंत राष्ट्र में होता है समूह की यह कृमिक वृद्धि प्रायः आदिम जातियों में पायी जाती है। इन आदिम जातियों को हम जनजाति कहते हैं। जनजात एक ऐसे समूह का नाम है जो आर्थिक दृष्टि से आत्म निर्भर होता है तब इस समूह के सभी लोग मिलकर एक हो जाते हैं।
उपर्युक्त विद्वानों के विचारों से स्पष्ट होता है कि जनजाति अपने-अपने क्षेत्र में मूल निवासी हैं, ये निश्चित भू-भाग में रहने वाले एक आदि मानव समूह हैं जो एक सामान्य भाषा, धर्म, प्रथा, परम्परा, व्यवसाय व अन्य सामाजिक नियमों के द्वारा एक सूत में बंधकर एक सामाजिक नियम को जन्म देते हैं इन्हें प्रगैतिहासिक तथा ऐतिहासिक काल की लंबी अवधि तक कई अविस्मरणीय अनुभवों को झेलते हुए राह तय करना पड़ा है। समय चक्रक की गतिशीलता ने उन्हें कई संस्कृतियों से सामना करना पड़ा है। जिसके कारण इनकी संस्कृति में बदलाव दिखाई पड़ते हैं।
भौगोलिक पृष्ट भूमि:-
सतना जिला भारत के राज्यों के मध्य में स्थित, मध्यप्रदेश राज्य में स्थित है। सतना, प्रदेश के उत्तर पूर्वी भाग में स्थित एक जिला है इसे विंध्य प्रदेश का प्रवेष द्वार कहा जाता है। जिले की स्थापना 1950 में हुई इसके पूर्व यह जिला रीवा रियासत के अधीना था। जिले को 11 प्रमुख शहरो और 2052 गाॅवों में बाॅटा गया है। इसका अक्षांषीय व देशान्तरीय विस्तार 230 580 - 250 120 उत्तरी अक्षांश व 800 200 पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थिति जिला सतना का कुल क्षेत्रफल 7,424 वर्ग किलोमीटर है। इस जिले की उत्तर से दक्षिण अधिकतम लंबाई 105 किलोमीटर एवं पूर्व से पश्चिम तक अधिकतम चैड़ाई 125 किलोमीटर है। समुद्र तल से इसकी ऊॅचाई 317 किलोमीटर है। प्रशासनिक रूप से इस लिे मं इस तहसीले क्रमषः मझगवाॅ, कोटर, विरसिंहपुर, रघुराजनगर, रामनगर, अमरपाटन, मैहर, उचेहरा, रामपुर बघेलान, नागौद है।
सतना जिले के उत्तरी सीमा में उत्तर प्रदेश के कर्बी व बांदा जिले, दक्षिण में मध्यप्रदेश का कटनी जिला पूर्व दिषा में रीवा, सीधी एवं शहडोल जिले में स्थित है पष्चिमी भाग में मध्यप्रदेश का पन्ना जिला इसकी सीमा का निर्धारण करते हैं। इसी प्रकार चैथे स्थान पर उचेहरा तहसील 19.74 प्रतिशत पांचवे स्थान पर रामपुर बघेलान 15.86 प्रतिशत, छठवें स्थान पर अमरपाटन 13.5 प्रतिशत, सातवें स्थान पर कोटर तहसील 8.69 प्रतिशत, नौवे स्थान पर नागौद 8.36 प्रतिशत जनजातीय जनसंख्या निवासरत है।
अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या ग्रामीण व नगरीय स्तर में भी अलग-अलग पाई जाती है। नगरों की अपेक्षा गांवों में अधिक जनसंख्या निवास करती है। समय-समय पर पुरूष वर्ग नगरीय रोजगार की प्राप्ति हेतु स्थानान्तरित होता रहता है फिर भी नगरीय जनसंख्या ग्रामीण जनसंख्या की अपेक्षा का संख्या में निवासरत है।
किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या का वितरण समान नहीं होता ठीक उसी प्रकार जनजातियों की जनसंख्या का वितरण भी समान नही हो सकता। जनसंख्या घनत्व विभिन्न, प्राकृतिक, सामाजिक व आर्थिक कारको द्वारा निर्धारित होता है। समतल, उपजाऊ भू-भाग में, मानव के अनुकूलित वातावरण, तापमान, वर्षा व जीवकोपार्जन के साधन भी जनसंख्या घनत्व को प्रभावित करते हैं। जनजातियाॅ मुख्यरूप से अपना निवास वीहड़ जंगलों में बनाती है। सतना जिले में इनका सर्वाधिक घनत्व रामनगर, मझगवाॅ व अमरपाटन तहसीलें आती हैं। जहाॅ पर घनत्व 50-60 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर में पाया जाता है। मध्यम जनसंख्या घनत्व मैहर, उचेहरा, रामपुर बघेलान तहसीलें आती हैं। जहाॅ घनत्व 30-50 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर में निवासरत हैं। सबसे कम जनसंख्या घनत्व नागौद तहसीले है, जहाॅ जनसंख्या घनत्व 30 व्यक्ति प्रति वर्गकिलोमीटर से भी कम पाया जाता है।
जिला सांख्यिकी पुस्तिका- सतना-2013
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01 |
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928 |
319975 |
14-30 |
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02 |
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89 |
43360 |
28-24 |
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03 |
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932 |
26672 |
15-86 |
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04 |
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920 |
19407 |
08-35 |
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05 |
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934 |
37697 |
19-74 |
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06 |
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943 |
30351 |
13-05 |
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07 |
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963 |
39871 |
25-01 |
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08 |
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940 |
70993 |
19-79 |
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09 |
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918 |
10090 |
07-61 |
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10 |
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928 |
9343 |
08-69 |
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11 |
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904 |
31191 |
08-38 |
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L=ksr tux.kuk 2011 |
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विश्लेषणः-
देश ही नही वरन् विश्व की जनसंख्या मे एक ऐसा भी समूह पाया जाता है जो षिकार, मछली पकड़कर, वनोपज संग्रह अथवा साधारण प्रकार की कृषि कार्यो मे लगा हुआ है और इन्ही साधनो के माध्यम से अपना भरण-पोषण कर जीवन-यापन करता है। इनकी संस्कृति व परम्पराओ में न्यून परिवर्तन हुये है इस प्रकार प्राचीनकालीन व्यवस्था पर आधारित ऐसे सभी समूह जो अपनी सभ्यता, संस्कृति को सुरक्षित रखने मंे सक्षम है। अनु. जनजातियो के नाम से संबोधित किया जाता है।
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार सतना जिले में जनजातियो की कुल संख्या 319975 है। जिले की संख्या से कुल अनुपात 14.36 प्रतिशत है। जनजातियो की संख्या के संकेन्द्रण के आधार पर जिले की संख्या को तहसीलवार विभक्त कर अध्ययन किया गया है। जिले में सर्वाधिक जनसंख्या मझगंवा तहसील में 43360 अनु. जनजातियो की संख्या है, जो कि तहसील की कुल जनसंख्या का 28.24 प्रतिशत है, यह क्षेत्र दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है, अधिकतम जनजातिया जंगलो मंे ही निवास करती है। जिले मे सबसे कम अनु. जनजातियो की संख्या का प्रतिशत 6.38 प्रतिशत है। यह तहसील नगरी निकाय के अंतर्गत है, जहाॅ पर जिला मुख्यालय है, जहाॅ अनु. जनजाति की संख्या 31191 है। मझगंवा तहसील के बाद दूसरे नंबर पर रामनगर तहसील आती है। यहाॅ की कुल जनसंख्या का 25.01 प्रतिशत जनजाति जनसंख्या निवास करती है। तीसरे स्थान पर मैहर तहसील का स्थान आता है जहाॅ कुल जनसंख्या का 19.79 प्रतिशत भाग जनजाति जनसंख्या का है।
निष्कर्षः-
वास्तव में भारत भूमि जनजाति समूहो के भिन्नात्मक स्वरुप का एक अच्छा उदाहरण है। जिले में प्रमुख रूप से निवासरत जनजातिया गोंड, भील, बैगा, कोल, मसाई आदि जनजातिया है। ये जनजातिया प्रमुख रूप से आदिम युगीन जीवन व्यतीत कर रही है । जनजातियो का कुछ समूह जो वर्तमान सभ्यता, संस्कृति के संपर्क मंे आ गई है। उनके रहन-सहन, संस्कृति, गृह-निर्माण, वस्त्र, साज-सज्जा में परिवर्तन आ गया है, किन्तु जो जनजातिया आधुनिक सभ्यता से दूर जंगलो मे जीवन-यापन कर रही है और वनांचल को ही अपना आश्रय स्थल मान रही है वो अपनी संस्कृति सभ्यता को संजोए हुए है और एक-दूसरे के सन्निकट ही अपने समुदाय के साथ जीवन-यापन कर रही है क्योंकि वनांचल से ही खाने-पीने की वस्तुए प्राप्त हो जाती है और वनो से प्राप्त होने वाले फल, फूल, कंद, जड़ीबूटिया, लकड़ी, जंगली जानवरो के अवशेष से आर्थिक लाभ विक्रय कर प्राप्त करते है। अतः जनजातिया जंगलो से प्राप्त पदार्थो में अपने को आत्मनिर्भर पाती है। मझगंवा तहसील में जनजातियो के अत्यधिक घनत्व में बसे होने का प्रमुख कारण वहाॅ वनो की उपलब्धता है इन जनजातियो मे शिक्षा का प्रसार करके सामाजिक कार्यकताओ द्वारा, सरकारी योजनाओ का सार्थक क्रियान्वयन कर इन्हे सभ्य समाज के संपर्क में लाकर इनके जीवन शैली में परिर्वतन लाया जा सकता है।
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Received on 19.12.2020 Modified on 24.12.2020
Accepted on 27.12.2020 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2020; 8(4):187-190.